घोर अंधकार में फसी रही, अब प्रकाशित हो जाने दो
मां मुझे दीया जलाने दो
अपना सर्वस्व लुटाया है मैंने, सदियों अनेकों जन्मों में
समाज की पहचान बन उलझी रही कितने धर्मों में
ऊंच नीच से तंग आ चुकी, अब स्वयं को भूल जाने दो
मां मुझे दीया जलाने दो
प्रीतम बनी, प्रेमी बनी, और बनी मां बाप
कीट पतंगा बन बन आयी, धोने सारे पाप
इस मधुर वीणा की धुन में, सच्ची प्रीत बन जाने दो
मां मुझे दीया जलाने दो
जब था उदगम उज्जल मेरा, तो मैने कालिमा कहां से पायी
जीवन सुखी बनाने को सबका, करती रही बस यही कमायी
किसी काम की ना रहूं, अब स्वार्थी बन जाने दो
मां मुझे दीया जलाने दो
होली, ईद और अनेक त्योहार, मनाये मैने साल हजार
दीवाली के रोशन दीप, मैंने सजाये हर दीवार
जगमग हो अन्तर मन मेरा, वो चिंगारी लगाने दो
मां मुझे दीया जलाने दो
अभेद्य, अजय, अभय, अनंत, अनूप, अगम और अनामी
सबके होंगे मोहन प्यारे, सबसे ऊपर मेरा स्वामी
इस की चरण-धूड़ से अपनी कालिमा हटाने दो
मां मुझे दीया जलाने दो
घोर अंधकार में फसी रही, अब प्रकाशित हो जाने दो
मां मुझे दीया जलाने दो
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Dear Master
Show me the internal light
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