कोई तो यूं भी दिलाये यादें बचपन की,
हल्की सी शरारत या मामूली अनबन की..
ग़ुस्से से मुँह फुला लेना वो मेरा
उसपे जीभ चिढ़ा देना वो तेरा
टाफी भरी जेब और गुल्लक की खनखन की
कोई तो यूं भी दिलाये यादें बचपन की
दोपहरी में पीपल पे कंचे चटकाना
गुलमोहर की डाली से पतंगें छुटाना
दीपू के मामा की नई टमटम की
कोई तो यूं भी दिलाये यादें बचपन की
बबीता का रहना पढाई में आगे
हमारे बाबूजी पिटाई में आगे
साबू, मोटु-पतलू और नंदन की
कोई तो यूं भी दिलाये यादें बचपन की
बहुत खूब बीता यूं बचपन हमारा
दस्तक दे रहा था लड़कपन बेचारा
पोलिश जूते,शहरी बनठन की
कोई तो यूं भी दिलाये यादें बचपन की
कोई तो यूं भी दिलाये यादें बचपन की,
हल्की सी शरारत या मामूली अनबन की |
2 comments:
bachpan mai ki har baat kya masum hua karti hai. agar woh bachpan rahe sabke man mai toh na ho mumbai mai humle na koi bhed bhav.
bachpan ko ek baar fir se jeene ko ji chahta he..
very nice poem..purani yaadein taja ho gayi!!1
Post a Comment