Wednesday, December 31, 2008

मेरे हाल से तू नावाकिफ तो नहीं


मेरे हाल से तू नावाकिफ तो नहीं, सैलाब हमने आँखों में छुपाये बहुत हैं
आरजू तेरे दर को सुर्ख करने की, लहू से सफेद रूह से काले साये बहुत हैं

तू है इस जीनते-आलम में, तेरा नूर कामिल साहिर के बस में नहीं है
जहां सोचा वहां ढूंढा किया, यकीनन तू है बस जहां पाया नहीं है
ये ज़हमत ही आलम की बस खरीदी है मैने, जख्म हमने ऐसे तो पाये बहुत हैं
मेरे हाल से तू नावाकिफ तो नहीं, सैलाब हमने आँखों में छुपाये बहुत हैं

जार जार होके बिखरना यूं मेरा, बारह-बार जुबां को रफीकी बनाना
राघबत दिल की सब पे जाहिर यूं करना, गली-कूचा मुहब्बत-ए-ह्कीकी सुनाना
साहिल पे आ के भी ना हासिल हुआ कुछ, झूठे यूं मदरसे हमने बनाये बहुत हैं
मेरे हाल से तू नावाकिफ तो नहीं, सैलाब हमने आँखों में छुपाये बहुत हैं

कतरा कतरा तुझ से मिलने की ख्वाहिश, जली सी ख़लिश दिल की बुझती नहीं है
सुनने को बेचैन निदा-ए-आसमानी, सूरत तेरी को तरसे दिल की ज़मीं है
मुहब्बत दे तेरी अब बर्बाद कर दे, लुत्फ-ए-इश्क़-ए-गम दुनिया के चाहे बहुत हैं
मेरे हाल से तू नावाकिफ तो नहीं, सैलाब हमने आँखों में छुपाये बहुत हैं

कायम है आलम तेरे कलमा-ए-नूर से, स्याह रंग का साया इधर भी खड़ा है
होंगे तो होंगे पैगम्बर्-ओ-पीर जहां के, मेरे लिये तो तू रब्ब से बड़ा है
अब के ही निकला है लहू आँखों से, वरना हाल-ए-दिल कई मर्तबा सुनाये बहुत हैं
मेरे हाल से तू नावाकिफ तो नहीं, सैलाब हमने आँखों में छुपाये बहुत हैं

मायूस कर दे मख़सूस कर दे, बस मेरी स्याह रूह को महफ़ूज कर दे
रंज-ए-गम तेरा, बने नशा ऐसा भारी, पैमाना तू मेरा इस कद्र भर दे
ता-उम्र बन जाऊं पत्थर तेरे दर पे, कि जाम महफ़िल में दुनिया की उठाये बहुत हैं
मेरे हाल से तू नावाकिफ तो नहीं, सैलाब हमने आँखों में छुपाये बहुत हैं

ख़लिश है ये ऐसी, ना बनती बनाये है ना मिटती हटाये
खुशनुमा होने के गुमान इतने इतने, लबों से निकले मेरे सिर्फ हाय
जमाना मेरी ये ख़ुमारी ना तोड़े, मर्ज हमने पहले ही करवाये बहुत हैं
मेरे हाल से तू नावाकिफ तो नहीं, सैलाब हमने आँखों में छुपाये बहुत हैं

खजालत है ऐसी कि हद हो गयी है
बेईमानी मेरी सर-ए-हद हो गयी है
मुझे खाक कर यूं कि जमाना गवाह हो, हव्विया के पास अब आये बहुत हैं
मेरे हाल से तू नावाकिफ तो नहीं, सैलाब हमने आँखों में छुपाये बहुत हैं

मेरे हाल से तू नावाकिफ तो नहीं, सैलाब हमने आँखों में छुपाये बहुत हैं
आरजू तेरे दर को सुर्ख करने की, लहू से सफेद रूह से काले साये बहुत हैं

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begging mercy at lotus feet of my master
- N

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