Friday, January 2, 2009

नये साल की शाम


नये साल की शाम को क्या चाहिये
कुछ कलम, अपने बीते कल को लिखने के लिये
गाढी स्याही, इतनी स्याह कि दर्द अपनी पहचान खो दे
काले अन्धेरे में दबा रहे
और हम सब कुछ भूल कर उसको सिर्फ और सिर्फ दर्द कहें
हिन्दू भी दर्द कहे और मुसलमान भी दर्द समझे
आखिरकार काला रंग तो सब के लिये काला ही होता है...
जैसे सबका लहू सुर्ख होता है

नये साल की शाम को क्या चाहिये
कुछ शायर, अपने अपने टूटे दिलों को सहेज कर रखने की कोशिश करते हुए
कुछ नज़्में, एक शख़्स के दिल से दूसरे के दिल तक जाती हुई
दिल की आवाज़ तो एक जैसी ही होती
है
सबकी धड़्कनें वैसे ही बढती हैं
जैसे कि थमती हैं...
जैसे सबका लहू सुर्ख ही होता है

तो आओ फिर एक नयी शाम वैसे गुज़ारें..
जैसे पहले नुक्कड़ पर मेहफिलों में दिखती थी
शाम की हवाओं में इबादत की खुशबू होती थी
तो कहीं गुड्गुड़ाते हुए हुक्कों के ठहाके..
आओ हम फिर
एक बार ज़ानवर बनने की सोचें
क्योंकि उनका कोई धर्म या मज़हब नहीं होता
बड़े प्यार से एक साथ रहते हैं..
उनके सुख और दुख भी सांझे और एक सरीखे होते हैं..
कहीं भी तो द्वैत नहीं होती..
तो फिर हम इन्सान विवेक से परिपूर्ण हो कर भी
इतना सा फर्क समझ नहीं पाते ?

नये साल की शाम को क्या चाहिये
वही पुराने लोग..
वही पुरानी सोच..
वही पुराना प्यार..
सब कुछ पुराना..
जब सब कुछ निस्छल और निस्वार्थ था !

1 comments:

मुकेश कुमार तिवारी said...

नवीन,

आओ हम फिर एक बार ज़ानवर बनने की सोचें
क्योंकि उनका कोई धर्म या मज़हब नहीं होता
कही ना कहीं यह मेरे मन की बात भी आपने कह दी. जिन्दगी का कडुआ सच.

बधाईयाँ.

मुकेश कुमार तिवारी