कुछ दिनों से दिल अनमना सा है, इसीलिये थोडा ही लिखा करूंगा। जो भी है रहेगा हमेशा की तरह आत्म-वेदना ही ....
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उसे मेरी मसरूफियत से नाराज़गी रही
तभी उस के साथ उस की आवारगी रही
कोइ ढूंढे उसे कि आज मैं तमाम हुए जाता हूं
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आंख तेरी में सादगी का शीशा है
चेहरा भी तेज लपटों में सूरज है
अब दो ही मुनासिब रास्ते हैं -
हो जाइये चूर या जलते रहिये
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वो को आपने मेरी रंग - ए - जवानी के तमाशे देखे
और रौनक - ए - महफिल जो बनाये रखा,
हकशुदा कर दीजिये - अदाकार का काम पूरा हुआ
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मेरे प्राणों से प्यारे प्रीतम के लिये....
सिर्फ तुम्हारा
- नवीन
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उसे मेरी मसरूफियत से नाराज़गी रही
तभी उस के साथ उस की आवारगी रही
कोइ ढूंढे उसे कि आज मैं तमाम हुए जाता हूं
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आंख तेरी में सादगी का शीशा है
चेहरा भी तेज लपटों में सूरज है
अब दो ही मुनासिब रास्ते हैं -
हो जाइये चूर या जलते रहिये
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वो को आपने मेरी रंग - ए - जवानी के तमाशे देखे
और रौनक - ए - महफिल जो बनाये रखा,
हकशुदा कर दीजिये - अदाकार का काम पूरा हुआ
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मेरे प्राणों से प्यारे प्रीतम के लिये....
सिर्फ तुम्हारा
- नवीन
3 comments:
नवीन जी,
क्या बात है. मशरुफियत को बडी शिद्द्त से बयाँ किया है. और उसके बाद की हसरत की कोई ढूंढे उसे मैं तमाम हुये जाता हूँ. मजा आ गया. यह हम जैसे प्रोफेशनल प्रेसर से पीडितों की अंर्तव्यथा है.
बधाईयाँ.
मुकेश कुमार तिवारी
'तुम से मोहब्बत के तकाज़े ना निभाये जाते
वर्ना हम को भी हसरत थी कि चाहे जाते'
baat kehte-kehte kitna maarmik
smaapan kiya hai aapne...
poori rachna antas ki kash.m.kash
ko ujagar karne mei safal hai...
---MUFLIS---
Unko dekhte hi arman machlne lagte hai,
unke rang har ang pe charne lagte hai,
Hum nai chahte deedar unka vo na yeh soch lai ya khuda,
Sach to yeh hai k unko dekh kar hum bin sanso k bhi jeene lagte hai.
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