Tuesday, February 10, 2009

तूने साथ गर मुझे लिया होता

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तूने साथ गर मुझे लिया होता
तो इस कदर रूखा और बेजान तो ना होता..
तेरे चेहरे के जख़म पर मरहम भी असर कर गया होता..
मरहम, जिसकी खुशबू मेरे जिस्म मे कमरे में रहती है
मेरा दिल भी अजीब से मर्ज का आशिक है..
इसमें बेपनाह मरहम तो है पर दर्द नहीं...
तूने गर मेरी इक याद को भी अपने पास रखा होता..
तो इतना बे-शुक्रा ना होता..
तुझे तमीज़ होती कि दर्द को सहेज के कैसे रखते हैं..
यूं ही सबके सामने जाहिर तो नहीं कर देते..
उस पर सरे-आम झूठ कि तुझको इस से फर्क नहीं..
सही कहा है शायर भी अल्लाह के बाद आते हैं..
अन्दर की खबर रखते हैं..
देख तुझे मिला है दर्द और ना-तमीजी
बेरुखी, तन्हाई और मुझे अजीजी
मेरे मरहम को असर करने में इतना अर्सा नहीं लगता
जितना कि तेरे दर्द को उठ कर थम जाने में..
अब बस ज़ेहन में यही बुदबुदा रही हूं...
'तुम से मोहब्बत के तकाज़े ना निभाये जाते
वर्ना हम को भी हसरत थी कि चाहे जाते'
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3 comments:

मुकेश कुमार तिवारी said...

नवीन जी,

एक बहुत ही बेत्कुल्ल्फ कविता जो बेबाकी से सीधे सीधे दिल की बात कह देती है. मुझे विशेषकर अंतिम लाईने बहुत पसंद आयी हैं " तुम से मोहब्ब्त के तकाजे ना निभाये जाते / वर्ना हम को भी हसरत थी के चाहे जाते "

मुकेश कुमार तिवारी

समयचक्र - महेन्द्र मिश्र said...

रंगों के पर्व होली पर आपको ढेरो शुभकामनाए

hem pandey said...

'हम को भी हसरत थी कि चाहे जाते'
- हर इंसान यह हसरत पाले रहता है. यह अलग बात है कि कुछ की हसरत पूरी होती है और कुछ की नहीं.