Wednesday, August 25, 2010

मोहे भूल गये सांवरिया

मो बिरहन को कछु ना सुहावे
बाट तकूं जब लग नहीं आवे
काटो फंद चॉरासी फेरा
मोहे ना बिसारो मैं जन तेरा

सखियां सगरी संग पिया गयी
कुमतियन की मत भी भा गयी
मो पे काहे चित नाहीं तेरा
मोहे ना बिसारो मैं जन तेरा

इकली ही अब पनघट जाऊं
रोती रोती गागर भर लाऊं
इत उत देखूं कहां 'नटखट' मेरा
मोहे ना बिसारो मैं जन तेरा

था तो नर और सबल सरीरा
अबला बन रोऊं नैनन ले नीरा
सगल जनम बन रहूं तेरा चेरा
मोहे ना बिसारो मैं जन तेरा

ना मैं देख्या चकोर ना पपीहा
मुख में "शब्द" नाहीं जीव्हा
माता कहे सुत बावरा मेरा
मोहे ना बिसारो मैं जन तेरा

मो है पतो तुम दिल की जानो
यहीं बसो तुम करो बहानो
तुम नाहीं छाड़ो अबकी बेरा
मोहे ना बिसारो मैं जन तेरा

प्रेम बनायी बावरी मीरा
सूरदास भय लागी पीरा
अब बिकल भयो जीवन हेरा
मोहे ना बिसारो मैं जन तेरा

मो बिरहन को कछु ना सुहावे
बाट तकूं जब लग नहीं आवे
काटो फंद चॉरासी फेरा
मोहे ना बिसारो मैं जन तेरा....
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तुम्हारी याद में... हमेशा !

3 comments:

Anonymous said...

Dear Naveen,

I m deeply touched with this poem.

Plz give me a hint, in the 5th pharagraph "SHABD" referes what??

Anonymous said...

Dear Reader,
"Shabd is what this creation stands upon, the real truth, we know it by Word, Tao, Naam, Naad, Shabad, Hukam... and many other references. Only a complete living perfect Master delivers you the method and grace and connects you with this Shabd."
Rest this page is not appropriate place to write more about it.. I dont want to portray pictire of some religious sect over here... so we can discuss via emails... wisdom.notes@gmail.com

mp said...

thnx. I got ur point.